भगवद गीता सनातन धर्म का सबसे पवित्र और व्यवहारिक ग्रंथ है।
यह महाभारत का एक महत्वपूर्ण भाग है, जिसमें कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच हुआ दिव्य संवाद वर्णित है। गीता मनुष्य को कर्तव्य, धर्म, कर्म, भक्ति और ज्ञान का संतुलित मार्ग दिखाती है।
भगवद गीता केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला सिखाने वाला शास्त्र है। यह हमें सिखाती है कि— मनुष्य को अपने कर्तव्य का पालन बिना फल की चिंता किए करना चाहिए। गीता हर युग, हर परिस्थिति और हर व्यक्ति के लिए समान रूप से उपयोगी है।
भगवद गीता में कुल 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। गीता के 18 अध्यायों का सार
गीता बताती है कि तीनों मार्ग एक-दूसरे के पूरक हैं।
कर्तव्य का पालन फल की इच्छा के बिना।
ईश्वर के प्रति निष्काम प्रेम और समर्पण।
सत्य और आत्मा के विवेकपूर्ण ज्ञान द्वारा मोक्ष।
आज के तनावपूर्ण जीवन में गीता मानसिक शांति, आत्मसंयम और सही निर्णय लेने की प्रेरणा देती है। गीता सिखाती है:
गीता के अनुसार मोक्ष केवल संन्यास से नहीं, बल्कि सही कर्म और शुद्ध मन से प्राप्त होता है। जो व्यक्ति कर्तव्य करते हुए ईश्वर का स्मरण करता है, वही सच्चा योगी है।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
कर्म करना तेरा अधिकार है, फल पर नहीं।
भगवद गीता हर मनुष्य के लिए एक दिव्य मार्गदर्शक है। यह जीवन को धर्म, ज्ञान और भक्ति से आलोकित करती है।