महाभारत सनातन धर्म का सबसे विशाल और गहन महाकाव्य है,जिसकी रचना महर्षि वेदव्यास ने की। यह केवल युद्ध की कथा नहीं, बल्कि मानव जीवन के हर पक्ष का गहन दर्शन है। महाभारत में धर्म और अधर्म के संघर्ष के माध्यम से कर्तव्य, नीति, राजनीति, समाज और आत्मज्ञान का वर्णन किया गया है।
महाभारत यह सिखाता है कि— धर्म का मार्ग कठिन होता है, परंतु अंततः वही सत्य और विजय का कारण बनता है। यह ग्रंथ राजा से लेकर सामान्य मनुष्य तक हर व्यक्ति को उसके कर्तव्यों की याद दिलाता है।
महाभारत कुल 18 पर्वों में विभाजित है और इसमें लगभग 1,00,000 श्लोक हैं। महाभारत का हृदय भगवद गीता है, जो श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद के रूप में प्रस्तुत है।
धर्म, नीति और दिव्य मार्गदर्शक
कर्तव्य और आत्मसंघर्ष का प्रतीक
प्रतिज्ञा और त्याग
गुरु धर्म
दानवीरता और संघर्ष
सत्य और धर्म
अहंकार और अधर्म
महाभारत बताता है किजीवन श्वेत श्याम नहीं, बल्कि जटिल परिस्थितियों से भरा होता है।
आज के युग में भी महाभारत राजनीति, नेतृत्व, परिवार और नैतिक मूल्यों की सही दिशा दिखाता है। यह हमें सिखाता है कि सत्ता से पहले संयम और धर्म आवश्यक हैं।
महाभारत हमें सिखाता है: कर्म का फल निश्चित है अधर्म का अंत निश्चित है अहंकार विनाश का कारण है सत्य और नीति सर्वोपरि हैं “धर्मो रक्षति रक्षितः” जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
महाभारत केवल इतिहास नहीं,बल्कि मानव चेतना का दर्पण है।